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महाराष्ट्र में चारे की 20% से ज्यादा कमी, पशुपालकों के लिए 496 करोड़ की नई नीति

2.78 करोड़ पशुओं वाले राज्य में हरा चारा 22.79% और सूखा चारा 21.43% कम है।

EngBen संपादकीय टीम ·
प्रतीकात्मक चित्र (AI से बनाया गया)। यह किसी वास्तविक घटना, व्यक्ति या वाहन की तस्वीर नहीं है।

मुख्य बातें

  • महाराष्ट्र में हरे चारे की 22.79% और सूखे चारे की 21.43% कमी।
  • राज्य में करीब 2.78 करोड़ पशु हैं।
  • 496 करोड़ रुपये की चारा विकास नीति, लगभग 12,000 रोजगार की उम्मीद।

पशुओं के सामने बड़ा संकट

सूखे की मार झेल रहे महाराष्ट्र में अब पशुओं के लिए चारे का संकट गहरा गया है। CNBC-TV18 की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में करीब 2.78 करोड़ पशु हैं। हरे चारे की जरूरत 1,176.78 लाख मीट्रिक टन है, जबकि उपलब्धता 907.49 लाख मीट्रिक टन ही है। यानी 22.79% की कमी।

सूखे चारे में भी जरूरत 377.87 लाख मीट्रिक टन के मुकाबले उपलब्धता 296.62 लाख मीट्रिक टन है, जो करीब 21.43% कम है।

496 करोड़ की चारा विकास नीति

इस स्थिति को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने बुधवार को चारा विकास नीति की घोषणा की। सरकार ने इसके लिए 496 करोड़ रुपये आवंटित करने और लगभग 12,000 रोजगार पैदा होने की उम्मीद जताई है।

नीति के तहत परती जमीन, खाली सरकारी जमीन और चराई भूमि पर चारे की खेती बढ़ाई जाएगी। चारे की पोषण गुणवत्ता सुधारने पर भी ध्यान दिया जाएगा।

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तुरंत राहत पर फोकस

मौजूदा कमी को देखते हुए सरकार का कहना है कि फिलहाल कम पानी में उगने वाले चारे के उत्पादन पर जोर रहेगा, क्योंकि कई हिस्सों में पानी की भारी कमी है। लंबी अवधि में चारे की उपलब्धता बढ़ाना नीति का दूसरा लक्ष्य है।

हालांकि सबसे बड़ी चुनौती अभी की कमी है, क्योंकि सूखे से खेती का उत्पादन घटा है और इससे आने वाले महीनों में चारे की उपलब्धता और प्रभावित हो सकती है।

पशुपालक इन बातों पर ध्यान दें

चारे की कमी के समय पशुओं को भूखा रखना दूध उत्पादन और स्वास्थ्य दोनों पर बुरा असर डालता है। पशु चिकित्सक सलाह देते हैं कि उपलब्ध सूखे चारे को यूरिया-उपचार या साइलेज जैसी विधियों से अधिक पोषक बनाया जा सकता है, लेकिन यह विशेषज्ञ की देखरेख में ही करें।

अपने नजदीकी पशुपालन विभाग कार्यालय से चारा बीज, चारा डिपो या सब्सिडी योजनाओं की जानकारी लें। पशुओं के लिए साफ पानी की व्यवस्था और गर्मी से बचाव भी उतना ही जरूरी है।

दूध और गांव की कमाई पर असर

पशुपालन लाखों ग्रामीण परिवारों की नियमित आय का जरिया है। चारे की कमी से दूध उत्पादन घटा तो इसका असर दूध की कीमतों और ग्रामीण कमाई दोनों पर पड़ सकता है। इसलिए नीति का जमीन पर तेजी से लागू होना जरूरी है।

स्रोत और आगे पढ़ें

यह लेख ऊपर दिए गए स्रोतों की जानकारी के आधार पर EngBen ने अपने शब्दों में तैयार किया है। आरोपित व्यक्ति अदालत में दोष साबित होने तक निर्दोष माने जाते हैं। कीमतें एक्स-शोरूम हैं और बदल सकती हैं।

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