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मानसून 13% कम बरसकर विदा, अब रबी फसल के सामने पानी की असली परीक्षा

अक्टूबर में भी सामान्य से कम बारिश का अनुमान है; महाराष्ट्र के तीन-चौथाई तालुके सूखाग्रस्त घोषित।

EngBen संपादकीय टीम ·
प्रतीकात्मक चित्र (AI से बनाया गया)। यह किसी वास्तविक घटना, व्यक्ति या वाहन की तस्वीर नहीं है।

मुख्य बातें

  • मानसून 2026 करीब 13% कमी के साथ खत्म, 2015 के बाद सबसे कमजोर।
  • अक्टूबर में भी सामान्य से कम बारिश का अनुमान।
  • महाराष्ट्र ने 358 में से 265 तालुके सूखाग्रस्त घोषित किए।

चार महीने, और हाथ आया घाटा

देश का चार महीने का दक्षिण-पश्चिम मानसून करीब 13% बारिश की कमी के साथ खत्म हो गया है। बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने इसे 2015 के बाद सबसे कमजोर मानसून बताया है। विभाग ने अक्टूबर में भी सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है, जबकि अल नीनो के नवंबर में चरम पर पहुंचने की संभावना है।

मानसून देश की सालाना बारिश का बड़ा हिस्सा लाता है और लगभग आधी खेती अब भी इसी पर निर्भर है।

रबी फसल क्यों ज्यादा दबाव में

इंडिया टुडे की रिपोर्ट बताती है कि खरीफ फसलें सीधे मानसून की बारिश पर टिकी होती हैं, जबकि गेहूं, चना और सरसों जैसी रबी फसलें मिट्टी की बची नमी, सिंचाई, जलाशयों और भूजल पर निर्भर करती हैं। अगर मानसून इन स्रोतों को ठीक से रिचार्ज नहीं कर पाया, तो रबी में पानी का संकट गहरा सकता है।

विशेषज्ञ कहते हैं कि कमजोर मानसून का मतलब अपने आप रबी की विफलता नहीं है, लेकिन जहां बारिश असमान रही, वहां बुवाई के समय नमी कम मिल सकती है।

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महाराष्ट्र सबसे ज्यादा प्रभावित

महाराष्ट्र सरकार ने अपने 358 में से 265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया है, यानी राज्य का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा। लंबे सूखे दौर ने वहां खरीफ फसलों को नुकसान पहुंचाया है और पानी की आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है। कर्नाटक में भी कई क्षेत्रों में सूखा घोषित हुआ है।

किसान ये गलती बिल्कुल न करें

कृषि विशेषज्ञों की सलाह है कि बुवाई से पहले अपने खेत की नमी और कुएं-बोरवेल के पानी का आकलन करें। जहां पानी सीमित है, वहां ज्यादा पानी वाली फसलों में भारी निवेश करने से बचें। चना, सरसों और मसूर जैसी कम पानी वाली फसलें बेहतर विकल्प हो सकती हैं।

ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सिंचाई विधियां पानी बचाती हैं। फसल बीमा योजना में समय पर नामांकन करवाएं ताकि मौसम से नुकसान होने पर सुरक्षा मिल सके। राज्य कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्रों की स्थानीय सलाह पर ध्यान दें।

आम आदमी पर भी असर

कमजोर फसल का असर सिर्फ गांव तक नहीं रहता। अनाज, दाल और सब्जियों के दाम बढ़ने से शहरों में भी रसोई का बजट बिगड़ सकता है। आने वाले हफ्तों में सरकार के कदमों पर सबकी नजर रहेगी।

स्रोत और आगे पढ़ें

यह लेख ऊपर दिए गए स्रोतों की जानकारी के आधार पर EngBen ने अपने शब्दों में तैयार किया है। आरोपित व्यक्ति अदालत में दोष साबित होने तक निर्दोष माने जाते हैं। कीमतें एक्स-शोरूम हैं और बदल सकती हैं।

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