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कुएं सूखे, केले की फसल बर्बाद, फिर भी सूखा सूची से बाहर: नांदेड़ के किसानों का दर्द

आधिकारिक आंकड़े 94% सामान्य बारिश दिखाते हैं, लेकिन खेतों की हालत कुछ और कहानी कहती है।

EngBen संपादकीय टीम ·
प्रतीकात्मक चित्र (AI से बनाया गया)। यह किसी वास्तविक घटना, व्यक्ति या वाहन की तस्वीर नहीं है।

मुख्य बातें

  • मुदखेड़ और मुखेड़ तालुके आधिकारिक आंकड़ों में 94% सामान्य बारिश के कारण सूखा सूची से बाहर।
  • किसानों का आरोप है कि मौसम स्टेशनों के गलत आंकड़ों से नुकसान के बावजूद मदद नहीं मिली।
  • केला उत्पादक बेल्ट में कुएं सूखे और बागान मुरझा रहे हैं।

आंकड़े और जमीन में फर्क

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र के नांदेड़ जिले में मुदखेड़ और मुखेड़ तालुके के किसान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार ऑटोमैटिक वेदर स्टेशनों के आधिकारिक आंकड़े इन तालुकों में सामान्य की 94% बारिश दिखाते हैं, इसलिए इन्हें सूखाग्रस्त सूची में शामिल नहीं किया गया।

लेकिन इसी केला उत्पादक बेल्ट में कुएं सूख रहे हैं और बागान मुरझा रहे हैं। किसानों का कहना है कि गलत या खराब मौसम स्टेशनों की वजह से उन्हें कोई सरकारी मदद नहीं मिली।

दो साल से लगातार नुकसान

मुदखेड़ के एक 40 वर्षीय केला और सोयाबीन किसान ने बताया कि उनकी केले की फसल लगातार दो साल खराब हुई है। जून 2025 में लगाई गई फसल अत्यधिक गर्मी नहीं झेल पाई, और जून 2026 में लगाई गई फसल कुएं में पानी न होने से सूखने लगी है। उन्होंने आठ एकड़ में करीब 5 लाख रुपये लगाए थे।

मुखेड़ तालुके के एक अन्य किसान ने साढ़े तीन एकड़ में सोयाबीन बोई थी, जिसमें प्रति एकड़ लगभग 45,000 रुपये का खर्च आया। उनका कहना है कि फसल से लागत निकलना भी मुश्किल है।

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सूखा सूची से बाहर रहने का मतलब

सूखाग्रस्त घोषित होने पर किसानों को कई तरह की राहत मिलती है, जैसे मुआवजा, कर्ज वसूली में राहत और अन्य सहायता। सूची से बाहर रहने का मतलब है कि नुकसान झेलने के बावजूद ये किसान इन लाभों से वंचित रह जाते हैं।

आप भी इस स्थिति में हैं? ये कदम उठाएं

अगर आपके गांव में भी बारिश के आंकड़े और जमीनी हालात मेल नहीं खाते, तो ग्राम पंचायत और तहसील कार्यालय में लिखित आवेदन दें। फसल नुकसान की तस्वीरें, बुवाई के बिल और खर्च के कागज संभालकर रखें। यही सबूत सर्वे या पुनर्विचार में मदद करते हैं।

फसल बीमा कराया है तो नुकसान की सूचना तय समय सीमा में बीमा कंपनी या कृषि विभाग को जरूर दें। किसान संगठनों और जनप्रतिनिधियों के जरिए सामूहिक रूप से मांग उठाना भी असरदार हो सकता है।

बड़ा सवाल: मौसम स्टेशनों की सटीकता

यह मामला दिखाता है कि राहत योजनाओं के लिए इस्तेमाल होने वाले आंकड़ों का सही होना कितना जरूरी है। एक खराब मशीन हजारों परिवारों की मदद रोक सकती है। किसान अब इन स्टेशनों की जांच और दोबारा सर्वे की मांग कर रहे हैं।

स्रोत और आगे पढ़ें

यह लेख ऊपर दिए गए स्रोतों की जानकारी के आधार पर EngBen ने अपने शब्दों में तैयार किया है। आरोपित व्यक्ति अदालत में दोष साबित होने तक निर्दोष माने जाते हैं। कीमतें एक्स-शोरूम हैं और बदल सकती हैं।

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